जिन्दगी रुकती है, फिर आगे बढ जाती है...

ठहर गये हम भी जैसे बहते-बहते
नदी ठहर जाती है...

जैठ के पहर मैं
जैसे बहती नदी भी सूख जाती है...

धरती जो कभी तपती है
तो घनघोर घटा भी बरस जाती है...

मरते हुये को जैसे
कभी दुआ भी लग जाती है...

ये वक्त का पहिया है फिर
रात ये सुबह मैं बदल जाती है...

ठहर गये हम भी जैसे बहते बहते
नदी ठहर जाती है...

कुछ वक़्त का गम सही
जिन्दगी फिर करवट बदलती है...

ठहरी हुई नदी भी एक दिन
सैलाब खुद में बहुत लाती है...




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