कर्म और वाणी...
जब वक़्त अच्छा हो तो इन्सान मुह फाड़ कर चिल्लाता है, बुरे वक़्त पर मीठी वाणी अपनाने पर आ ही जाता है... कष्ट जो मिले कर्म के तो बहुत बड़ा ज्ञानी बन जाता है, फायदे मीठी वाणी के क्या है समझाने लगता है... बेढंगी देह को फिर अपनी झुटलाने लगता है, देह से बढ़कर सुन्दरता वाणी की है गाने लगता है... जुबां कुछ दिन ही सही सम्भालने तो लगता है, प्यार की चासनी मैं फिर जुबां अपनी दुबोकर रखता है ... औकात वो फिर से अपनी दिखाने ही लगता है, वक़्त अच्छा आते ही रंग वो गिरगिट सा जो बदलने लगता है... जब वक़्त अच्छा हो तो इन्सान मुह फाड़ कर चिल्लाता है, बुरे वक़्त पर मीठी वाणी अपनाने पर आ ही जाता है...