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Showing posts from April, 2018

कर्म और वाणी...

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जब वक़्त अच्छा हो तो इन्सान मुह फाड़ कर चिल्लाता है, बुरे वक़्त पर मीठी वाणी अपनाने पर आ ही जाता है... कष्ट जो मिले कर्म के तो बहुत बड़ा ज्ञानी बन जाता है, फायदे मीठी वाणी के क्या है समझाने लगता है... बेढंगी देह को फिर अपनी झुटलाने लगता है, देह से बढ़कर सुन्दरता वाणी की है गाने लगता है... जुबां कुछ दिन ही सही सम्भालने तो लगता है, प्यार की चासनी मैं फिर जुबां अपनी दुबोकर रखता है ... औकात वो फिर से अपनी दिखाने ही लगता है, वक़्त अच्छा आते ही रंग वो गिरगिट सा जो बदलने लगता है... जब वक़्त अच्छा हो तो इन्सान मुह फाड़ कर चिल्लाता है, बुरे वक़्त पर मीठी वाणी अपनाने पर आ ही जाता है...

जिन्दगी रुकती है, फिर आगे बढ जाती है...

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ठहर गये हम भी जैसे बहते-बहते नदी ठहर जाती है... जैठ के पहर मैं जैसे बहती नदी भी सूख जाती है... धरती जो कभी तपती है तो घनघोर घटा भी बरस जाती है... मरते हुये को जैसे कभी दुआ भी लग जाती है... ये वक्त का पहिया है फिर रात ये सुबह मैं बदल जाती है... ठहर गये हम भी जैसे बहते बहते नदी ठहर जाती है... कुछ वक़्त का गम सही जिन्दगी फिर करवट बदलती है... ठहरी हुई नदी भी एक दिन सैलाब खुद में बहुत लाती है...

मेरे ख्वाब तेरी यादें...

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ख्वाबों के समंदर मैं आज फिर डूबने जा रही हूँ , कलम रख कर किताबों मैं फिर सोने जा रही हूँ ... ना करना अब हमे इस रात मै परेशान ,, आज फिर मै उनकी यादो को जीने जा रही हूँ ...

काश कि ऐसा होता...

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ख्वाब वो भी हमारे देख लेते तो अच्छा था... तस्वीर मैं हमे भी अपनी बसा लेते तो अच्छा था,, समन्दर की गहराइयाँ जो हम होते तो अच्छा था... कुछ यूँ ही मुझमे वो डूब जाते तो अच्छा था,, सिवाए उनके कोई पास ना हमारे आता तो अच्छा था... सफ़र जज़्बात ऐ कश्तियों मैं मेरी वो कर जाते तो अच्छा था,, इस कदर मुझमें मोतियों सा वो बिखर जाते तो अच्छा था... हार मोतियों का बनाकर उन्हे हम पहन लेते तो अच्छा था,, काश कि अमृत सा उनके लिये हम बन जाते तो अच्छा था... पीकर हमे खुद मैं ही बसा वो लेते तो अच्छा था,,     

वो अनमोल रिश्ते कहाँ गुम गये ...

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बेरुखी यूँ रिश्तो मैं अब सही नही जाती हर बात अब जुबां से यूँ कही नही जाती... अब सिर्फ दौलत की चाह हर और जगी है, कुछ रिश्तो मैं बस पैसे की माया ही बची है... भाई-भाई की कहानी भी अब वो पुरानी सी है, पैसा-पैसा की ये पहेली अब ना सुलझी है... रिश्तो की दिखती क्यूँ ये सच्चाई है, घर-घर की अब क्यूँ यही कहानी सी है...

सच कहना तुम्हे मेरी कसम ...

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सुनो!! तुम्हारी माँ कहती है, मै तुम्हारे लायक नही हूँ... तुझ सी हजार मेरे बेटे पर मरतीं है,, माना कि ये उनका गुरूर सही, पर बस इतना सा बता दो,, क्या सचमुच दुनिया की हर लड़की तुम पर मुझ सी मरती है...

वफ़ा या बेवफ़ा

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बेपनाह मुहब्बत मैं उनकी हम इस कदर दीवाने थे, जुल्म करके हम पर ही.. वो हँस कर हमसे मिलते थे... वफा-बेवफ़ाई क्या होती है शायद वो न समझते थे, अन्जान इस दिल की वफ़ा से बेवफ़ाई वो करते थे... उन्हे वफ़ा भी उनसे थी... जिस्म पर जो मरते थे, सोचकर मुहब्बत है उसकी वो भी उस पर मरते थे... हमसे मिलकर तो हाल ए दिल की अपनी बाते करते थे, हम उनसे कैसे कहते कि हम भी उन पर मरते थे... तन्हाई भी अब हमसे हमारी कहती थी... कुछ मुहब्बत बस घुट-घुट कर ही रहती है,, तेरी वफ़ा मुहब्बत की.. शायद नसीब मैं नही उनकी... नसीब मैं कुछ की वफ़ा नही बेवफाऐ भी रहती है !!

काफिला ये तेरी यादों का...

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चाँद से कोई कह दो यूँ जाया ना करे, बड़ी मुस्किल से लौटे है ख्वाबों से उनके... सूरज से कह दो यूँ जल्दी आया ना करे, फिर से लौट गये है वो फिर रात के ख्वाबों के लिये... रात से कोई कह दो यूँ सोया ना करे, बड़ा लम्बा है ये दिन उनके बिना जीने के लिये... चलो फिर उठा लेती हूँ ये कलम अब अपनी, काफिला ये उनकी यादों का फिर से चलाने के लिये...

तेरी ये खामोशियाँ...

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लफ्ज़ ये तेरे खामोश ही सही, कुछ तो नजरों ने तेरी कहा होगा... माना कि मैने इन्हे पढ़ा नही, कुछ तो मैने भी इन्हे समझा होगा... तन्हाई मैं तेरा यूँ छिपकर रहना, कुछ तो जमाने ने तुझसे छीना होगा... नजरों का तेरा यूँ झुकाकर चलना, कुछ तो तूने भी इनमे छिपाया होगा... आँख का वो आँसू जो गिरा है तेरे गालो पर, कुछ तो है दर्द जो तूने दिल मैं बसाया होगा... खामोशी का ये आलम तेरा हर पहर, कोई तो है जो इनमे रहता होगा... जिन्दगी का तेरी यूँ मायूसी मैं जीना, कोई तो इसका गुनाहगार भी होगा...

अजीब है कुछ रिश्ते यूँ भी...

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अपने ही घर  मैं कुछ हाल यूँ हुआ है उनका, जरूरत के लिये सबको जरूरत है उनकी, पर जरूरत उनकी घर मैं है किसी को नही... रिश्तो मैं कुछ इस कदर बाँधा गया है उनको, तकाजा देकर वो बचपन के प्यार का अब जवानी मैं अकेले ही रिश्ते निभाने है उनको... तवज्जो घर मैं उनकी नही दूर-दूर तक किसी को, पर खून के रिश्ते सिर्फ उन्हे ही निभाने है याद ये हर वक़्त दिलाया जाता है अब उनको... उनका हक़ नही घर मैं किसी को कुछ कहने का उनका हक़ नही घर को अपना घर कहने का कहकर फिर घर ये तेरा है वसूला पूरा जाता है उनको... कुछ इस कदर रिश्तो मैं बाँधा जाता है उनको जरूरत के लिये प्यार बहुत जताया जाता है उनको तू इस घर का चौकीदार है बस इतना एहसास कराया है उनको.. अपने ही घर मैं कुछ हाल यूँ हुआ है उनका, कि जरूरत के लिये सबको जरूरत है उनकी, पर जरूरत उनकी घर मैं है किसी को नही...

दिल तेरा तोड़कर यूँ सुकूं मिला हमे ...

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उसके दिल को तोड़कर आज कुछ यूँ सुकूं मिला हमे, दिल मेरा तोड़कर किसी रोज वो भी मुकर गये थे,, आज ये होठों की बेबसी, आँखो मैं भरे आँसू उनके, रोते-बिलखते और सिसकियाँ लेते, वो भी हमे यूँ छोड़ गये थे.. सारी-सारी रात तुम भी अब चाँदनी रातो को ताकोगे अकेले... हमे भी तुम तन्हाई मैं अकेले-अकेले और अकेले ही छोड़ गये थे,, तुम्हे तो दिल तोड़ने की सजा सही तसल्ली तो होगी, हमे तो बिना गुनाह के मुहब्बत मैं तड़पते-रोते छोड़ गये थे... उसके दिल को तोड़कर आज कुछ यूँ सुकूं मिला हमे, दिल मेरा तोड़कर किसी रोज वो भी मुकर गये थे...

ऐ खुदा....

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मुनासिफ़ नही कि रोज तेरे दर पर सर झुका सकूं , ऐ खुदा इनायत इतनी रखना कि जहाँ भी रहूँ नाम तेरा ले सकूं,, गरीब हूँ, फकीर हूँ, पर रहम से तेरे लाचार नही हूँ,, दिनभर की मेहनत ही सही, पर तुझे हर वक्त याद कर सकूं,, मुनासिफ़ नही कि रोज तेरे दर पर सर झुका सकूं , ऐ खुदा इनायत इतनी रखना कि जहाँ भी रहूँ नाम तेरा ले सकूं ।।

वो तेरे वादे...

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वादे किये थे बहुत मुहब्बत मैं उन्होने अपनी, हम वादो पर उनके जिन्दगी अपनी जीते रहे... और वो बेवफाई पर बेवफाई करते चले गये,, पूछा जब, क्यूँ किया तुमने मेरे साथ ऐसा,, पूछा जब, क्यूँ किया तुमने मेरे साथ ऐसा,, हँस के कह गये, तुम दूर बहुत थे और वो बांहों मैं रोज आते थे हमारी.. नही पता था दूरियाँ मुहब्बत को मिटा देती है... वफ़ा को बेवफाई मैं बदल देती है... हमे तो दूर रहकर भी सिर्फ उनसे मुहब्बत रहती है !!     

मुद्दत सी हो गयी है...

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मुद्दत सी हो गयी है तेरी चाहत को जिये हुये, कि आ..आज फिर आकर मुझसे बेवफाई ही कर ले,, तू कहती थी, तुम्हे अपने इश्क़ मैं मार ही दूंगी, इस बेजान दिल को आज फिर उसी आग मैं जला दे,, आँखो के वो आंसू जो सूख चुके है मेरे, कि आज फिर उन पलकों को गीला ही कर दे,, जिन्दा तो हूँ अब तक, तुझे याद करते-करते, कि थक गया हूँ मै अब तुझमे रहते-रहते.. मुद्दत सी हो गयी है तेरी चाहत को जिये हुये, कि आ.. आज फिर आकर मुझे पूरा ही मार दे,,

क्या हो गया इस शहर को...

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क्या हो गया है इस शहर को, विचारो मै क्यूँ हर और धुआं सा उठा है,, चीख-पुकार सी मची है, हर शख्स जान बचाता फिर रहा है... विचारो मै तालमेल नही, हर शख्स एक-दूजे को उंगली उठा रहा है,, क्या हो गया है इस शहर को, विचारो मै क्यूँ हर और धुआं सा उठा है,, चौपाले जहाँ सजती थी यारो की परिवारो की खुशियों से, क्यूँ वहाँ नफरत, द्वेष,इर्ष्या, धोका, हर और पनप रहा है,, बुरा इन्सान- इन्सान बनता जा रहा है नफरत मैं, फिर क्यूँ धर्म एक-दूजे का बुरा सा लग रहा है,, बात देश को सुन्दर बनाने की चली है, फिर क्यूँ देश ये फूलों का उजाड़ा जा रहा है,, क्या हो गया है इस शहर को, विचारो मै क्यूँ हर और धुआं सा उठा है,, देश ये एकजुटता की कमी मैं, कहाँ का कहाँ जा रहा है।

बेटियो को बचाओ, अब जरूरत है कानून सख्त बनाओ

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  समझने की जरुरत है, समझाने की जरुरत है, हैवानो को अब सजा दिलाने की जरूरत है,, मर रही है बेटियाँ, मिट रही है औरते, हिन्दू-मुसलमान को एक होने की अब जरूरत है,, एक मासूम की जिन्दगी का जो ले सके हिसाब, उस सख्त कानून की अब जरूरत है,, जो कुचल रहे है मासूमो की जिंदगियां, उन्हे भी मिले सिर्फ मौत, अब यही एक इन्साफ जरुरी है,, बेटी को रख सके जो हिफाजत से, हमे अब उस देश की जरूरत है,, ना हिन्दू ना ही मुसलमान, हमे मिलकर और इन्सान बने रहने की अब जरूरत है,, समझने की जरुरत है, समझाने की जरुरत है, मिल सके इन्साफ, उस सख्त कानून की अब जरूरत है।।

जिन्दगी ये तेरी-मेरी..

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जिन्दगी एक तोह्फ़े से कम नही तेरी-मेरी, उस खुदा ने क्या खूब सोचकर हमे मिलाया होगा,, पीकर ये आंसू तेरे-मेरे गमं के, एक खूबसूरत सा जहां हमारा भी, बनाया तो होगा ... जिन्दगी एक तोह्फ़े से कम नही तेरी-मेरी, उस खुदा ने क्या खूब सोचकर हमे मिलाया होगा,

कश्मकश इस दिल की...

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अश्क़ बह चले... ना दूर जाने से उन्हे रोक सके, हम भी सच्ची मुहब्बत के भ्रम मैं थे, और वो चले गये... टूट - टूटकर बेखुदी मैं तेरी, दिल ये रोता रहा... रात भर ये दिल मुहब्बत मैं तेरी, जोरो से धड़कता रहा... कभी सोचा, लौटकर वापिस वो जरूर आयेंगे,, कभी सोचा, वो किसी और के तो नही हो जायेंगे...! दिल ने कहा रोक लूं तुझे, फिर सोचा तेरा इम्तिहांन भी लेंगे, हम जिस कदर टूटकर चाहते है तुझे, तेरी चाहत भी देख लेंगे,, पर सच्ची मुहब्बत मै ऐसा होता कहाँ  है,, मिटने वाले को मुहब्बत मैं, मुहब्बत का जहां मिलता कहाँ है,, याद रखना ऐ दिल दुखाकर दूर जाने वाले ,, रूह मैं बसकर मुहब्बत करने वाले, इस दुनिया मैं मिलते नही हैं !! अश्क़ बह चले ना दूर जाने से उन्हे रोक सके, हम भी सच्ची मुहब्बत के भ्रम मैं थे, और वो चले गये....!!

पंछियो की तरह ये जीवन तेरा-मेरा...

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पंछियो की तरह घर से निकल जायेंगे हम, कि शाम तक लौटने की दुआओं के साथ.. दाना तेरा और मेरा किस्मत मै जो है, चुग लाएंगे हम... धूप हो चाहे हो बारिश, पेट भरने को काम तो कर आयेंगे हम । मौसम है इस शहर का कुछ अजनबी सा, की शाम तक कोशिश है घर लौट आयेंगे हम... जीवन तेरा और मेरा ये पंछी की तरह है, कि दुआ है शाम तक लौट आयेंगे हम ...

लिखने -लिखने मैं भी बहुत फर्क होता है...

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लिखने -लिखने मैं भी बहुत फर्क होता है जनाब, कोई सिर्फ कलम से लिखता है, तो कोई जज़बात अपने दिल के लिख देता है... यूँ तकल्लुफ ना कीजिये जज्बातो को मेरे समझने की, यूँ तकल्लुफ ना कीजिये जज्बातो को मेरे समझने की... समझ अगर जो गये, तो भरी आंखो से फिर बरसात होगी. हाँ..लिखने -लिखने मैं भी बहुत फर्क होता है जनाब,, कोई सिर्फ काम से लिखता है, तो कोई वजह जीने की लिख देता है अपनी...

तुम सिर्फ मेरे हो मेरे ही रहना ...

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तुम सिर्फ मेरे हो मेरे ही रहना ... किसी और को अगर चाहा, तो जान ले लूंगी। मेरे दिल मैं बसे हो, मेरे दिल मैं ही रहना... किसी और के दिल तक अगर पहुंचे, तो जान दे दूंगी... तुम सिर्फ मेरे हो बस ये याद रखना,, भूल अगर गये,, तो तुम्हारी जान ले लूंगी...

जिन्दगी की दौड़...

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जिन्दगी की दौड़ मैं कुछ यूं मशगूल हुये हम साहब, कि जिन्दगी कब शाम कि तरह ढल गयी पता ही ना चला  !!

माँ...

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सुना है माँ  सा खूबसुरत रिश्ता कोई और नही है जमीं पर, फिर क्यू एक बेटे की माँ, बहू के आने पर बदल सी गयी है। शादी से पहले बेटे के हर दर्द को समझती थी जो माँ, फिर क्यू बेटे का प्रेम पत्नी के लिये देखकर, कुछ बदल सी गयी है। माँ सिर्फ माँ होती है, फिर चाहे बेटे या बहू की होती है आज क्यू माँ की ममता फिर, बेटे के प्रेम से जलने सी लगी है। जो कहती थी बहू नही बेटी बनाकर रखूंगी इसे... फिर क्यूं बेवजह वो माँ, लफ्जों से अपने मुकर सी गयी है। माँ सिर्फ माँ होती है, चाहे तेरी या मेरी होती है... ममता की छाँव ना मिले जँहा पर, फिर वो कैसी माँ होती है।।

ये मेरीं मुहब्बत ही है...

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तुमसे मुहब्बत हो गयी है, बड़ी ही शिद्द्त से हो गयी है सुनो अब मुझे यूं धोका ना देना, बीच मझधार मैं कही डुबो ना देना !!

इश्क़ दर्द है,अश्क़ है...

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इश्क़ दर्द है,अश्क़ है, बेन्तहां मोहब्बत भी है... इश्क़ ए मोहब्बत करना ए गालिब जरा सोचकर, रूठना, मनाना, तडपना, बिछडना सब मिलेगा इसमे.. कि जीना भी चाहो अगर, ये एक धीमा जहर सा होगा !!

तुम नही मिल सकती अब प्रिये...

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ढूंडने से तो भगवान भी मिल जाते है मगर तुम नही मिल सकती अब प्रिये, तुम हो चुकी हो किसी और की, ये सच्चाई दिल से झुटला सकता नही मै प्रिये, वो मंजर और होता कि तुम आ सकती, मेरे दिल को प्रेम से अपने महका सकती !! हां तुम भगवान नही हो प्रिये, जो मिल सको इबादत मैं मुझे , क्यूंकि तुम थी मेरी प्रिये, पर अब हो किसी और का प्रेम प्रिये!! ढूंडने से तो भगवान भी मिल जाते है मगर तुम नही मिल सकती अब प्रिये....

बेकरारी तेरे इश्क़ की...

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बेकरारी तेरे इश्क़ की कुछ यूं मेहसूस की मैने, तेरी इक झलक पाने की खातिर पूरी रात खुली आंखो मैं बिता दी मैने !! तू इश्क़ है, जुनूँ है, मोहब्बत है मेरी, इस सनक मै ही सही, रात भर की नीन्द गवां दी मैने !! तू मेरा है, मेरी सौच ही सही, ये जिन्दगी पूरी यही सोचकर बिता दी मैने !! बेकरारी तेरे इश्क़ की कुछ यूं मेहसूस की मैने, तेरी इक झलक पाने की खातिर पूरी रात खुली आंखो मैं बिता दी मैने ....

चाहत ये मेरी...

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चाहत है मुझे अंबर को छू लेने की, काश कि खुदा ने दो पंख मुझे भी दिये होते... चाँद तक पहुँच नही मेरी, तारे ही सही तोडे तो होते... सुन रे पँछी तुझ तक सही, बादलों तक तो पहुँचे होते... चाहत है मुझे अंबर को छू लेने की, काश कि खुदा ने दो पंख मुझे भी दिये होते...

इश्क़ को समझना...

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इश्क़ को समझना यूं तेरे बस की बात नही ए गालिब, इसे समझने से पहले तुझे खुद को समझना होगा !!