अजीब है कुछ रिश्ते यूँ भी...

अपने ही घर मैं कुछ हाल यूँ हुआ है उनका,
जरूरत के लिये सबको जरूरत है उनकी,
पर जरूरत उनकी घर मैं है किसी को नही...

रिश्तो मैं कुछ इस कदर बाँधा गया है उनको,
तकाजा देकर वो बचपन के प्यार का अब
जवानी मैं अकेले ही रिश्ते निभाने है उनको...

तवज्जो घर मैं उनकी नही दूर-दूर तक किसी को,
पर खून के रिश्ते सिर्फ उन्हे ही निभाने है
याद ये हर वक़्त दिलाया जाता है अब उनको...

उनका हक़ नही घर मैं किसी को कुछ कहने का
उनका हक़ नही घर को अपना घर कहने का
कहकर फिर घर ये तेरा है वसूला पूरा जाता है उनको...

कुछ इस कदर रिश्तो मैं बाँधा जाता है उनको
जरूरत के लिये प्यार बहुत जताया जाता है उनको
तू इस घर का चौकीदार है बस इतना एहसास कराया है उनको..

अपने ही घर मैं कुछ हाल यूँ हुआ है उनका,
कि जरूरत के लिये सबको जरूरत है उनकी,
पर जरूरत उनकी घर मैं है किसी को नही...




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