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Showing posts from May, 2018

राज़ छुपाकर रक्खा है...

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इक राज़ छुपाकर रक्खा है... इस दिल मै दबाकर रक्खा है... जो शामिल नही जिन्दगी मै मेरी, उस शख्स को शामिल रक्खा है... मिली नही मुहब्बत जिसकी, मेरी मुहब्बत को उसके लिये रक्खा है... इक राज़ छुपाकर रक्खा है... इस दिल मै दबाकर रक्खा है... चाहा नही जिसने हमे कभी, अपनी चाहत को उसके लिये रक्खा है... बेवफाई से उसका नाता सही, मेरा दिल वफ़ा का उसके लिये रक्खा है... जो छोड़कर मुझे अँधेरों मै गया, मेरे दिल मै उजाला उसके लिये रक्खा है... इक राज़ छुपाकर रक्खा है... इस दिल मै दबाकर रक्खा है... मेरे दिल को जिसने दिल ना समझा, उसके नाम को सीने मै दबाकर रक्खा है... इक राज़ छुपाकर रक्खा है... इक राज़ छुपाकर रक्खा है... _KD...

बुद्ध हो जायेंगे हम...

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प्रेम से अनुराग से शुद्ध हो जायेंगे हम... बुद्ध हो जायेंगे हम... द्वेष और नफरतों को पी शुद्ध हो जायेंगे हम... बुद्ध हो जायेंगे हम... सच्चाई के पथ पर जो चलो शुद्ध हो जायेंगे हम... बुद्ध हो जायेंगे हम... हृदय को जो निर्मल रखो शुद्ध हो जायेंगे हम... बुद्ध हो जायेंगे हम... मौक्ष का जो मन रखो शुद्ध हो जायेंगे हम... बुद्ध हो जायेंगे हम... जीवन का अर्थ समझो तो शुद्ध हो जायेंगे हम... बुद्ध हो जायेंगे हम...

मेरे कमरे की वो खिड़की...

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मेरे कमरे की खिड़की से, वो खुला आसमान नजर आता है मुझको,, माँ ये बहुत भाता है मुझको... हवा का झौंका वो सुबह-सुबह का, छूकर गुजर जाता है मुझको,, माँ ये बहुत भाता है मुझको... मन्दिर के वो भजन घन्टियाँ, सुबह-शाम सुनाई देती है मुझको,, माँ ये बहुत भाता है मुझको... मेरे कमरे की खिडकी से, तितलियाँ रँग-बिरंगी नजर आती मुझको,, माँ ये बहुत भाता है मुझको... रातो मै तारो की वो जगमग, दूर उस आसमान मै नजर आती है मुझको,, माँ ये बहुत भाता है मुझको... चिड़ियों की चहचहाट मै भी, मधुर संगीत सुनाई देता है मुझको,, माँ ये बहुत भाता है मुझको... मेरे बचपन का वो कमरा, वो खिड़की , और मेरा वो खुला आसमान,, माँ ये बहुत भाता था मुझको... गाँव अपना बहुत याद आता है मुझको,, बहुत याद आता है मुझको...

तुझसे दूर नही हूँ मैं...

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तुझसे दूर नही हूँ मैं... तेरे पास तेरे करीब हूँ मै,, दिल का तेरा एहसास हूँ मैं... सावन की घनघोर घटा बरसती है जब, वो तेज बरसता पानी हूँ मैं... तुझसे दूर नही हूँ मैं... जो सरसराहट से गुजर जाती है तुझे छूकर, वो तेज हवा का झौंका हूँ मैं... तेरे मखमल से पैरो तले जो दबती है, वो हरी दूब की घांस हूँ मैं... तुझसे दूर नही हूँ मैं... कहर बरसाती उस धूप मै भी, वो ठंडी-ठंडी छाँव हूँ मैं... दुख जब तुझको बड़ा रुलाये, सुख की तेरी उम्मीद हूँ मैं... तुझसे दूर नही हूँ मैं... तेरे लबों पर जो रुक-रुक कर आये, वो मन्द-मन्द मुस्कान हूँ मैं... जो धड़कता है तेरे दिल मै, उस दिल का अरमान हूँ मैं... तुझसे दूर नही हूँ मैं... तुझसे दूर नही हूँ मैं...

जो तुम आओ तो...

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हाल-ए-दिल बयाँ कर दें , ज़ख्म खुद्के खुद से ही भर दें , जो तुम आओ तो... गर्म रेत भी ठण्डी कर दें , उस तपिश को बारिश कर दें , जो तुम आओ तो... धरती बंजर हरी कर दें , घाटी वो फिर फूलो सी कर दें , जो तुम आओ तो... इस घर को मन्दिर कर दें , बुझते दिये को फिर भर दें , जो तुम आओ तो... आँखो मै चमक कर दें , होंठो पर हँसी कर दें , जो तुम आओ तो... फूलों मै महक कर दें , भवरों को अमर कर दें , जो तुम आओ तो...

एक बात बताओगे...

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एक बात बताओगे, क्या हम से मुहब्बत निभाओगे... हमे नीन्द बहुत आती है, क्या बिना बात किये रह पाओगे... एक बात बताओगे, क्या हम से वफ़ा निभाओगे... हम उड़ते हुये पंछी है, क्या सारा जहां हमे दे पाओगे... एक बात बताओगे, क्या हर वादा निभाओगे... हम अपनी बात के पक्के है, क्या तुम अपनी बात पर रह पाओगे... एक बात बताओगे, क्या मिलकर जिन्दगी बिताओगे... हमे साथ-साथ चलना है, क्या तुम भी कदम से कदम मिला पाओगे...

नींद मै कविता लिख रही हूँ...

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नींद मै कविता लिख रही हूँ , कुछ हक़ीक़त कुछ सपने लिख रही हूँ , जो समझ सके दिल की बात वो बात लिख रही हूँ... तेरे-मेरे गम हो कम वो दर्द लिख रही हूँ , छुपा के सारे शहर से तेरा नाम लिख रही हूँ , मिल जाये सारा जहां वो अरमान लिख रही हूँ... दिल के अपने घावों की दवा मै लिख रही हूँ , जो तुझको हो पसन्द वो बात लिख रही हूँ , तेरे-मेरे प्रेम के एहसास मै लिख रही हूँ... नींद मै कविता लिख रही हूँ  , चाँद और तारों की बात लिख रही हूँ , जो कर सके तू एहसास, वो जज़्बात लिख रही हूँ...     

कुछ अपने और पराये...

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सच कहते है, कुछ अपने नही पराये ही रहते है, खून के रिश्ते सिर्फ इनके अपने होते है, बाकी रिश्तो से इस कदर रूखे होते है... दिल तोड़ते है, धोका देते है,, ना हो खून का रिश्ता तो रँग बदल लेते है, अपनों को समेट लेते है, दूसरों को बिखेर देते है... सच कहते है कुछ अपने नही पराये ही रहते है, अपनों के दिल को ये दिल समझते है, ना हो अपनो का दिल तो मसल देते है... अपना कहकर दग़ा करते है, दग़ा करे जो उसे अपना कहते है, अपने-पराये मै कितना फर्क़ ये रखते है... बड़े अज़ीब है कुछ रिश्ते इनके, छींनने वाले को अपना कहते है, साथ देने वाले को पराया कहते है... सच कहते है, कुछ अपने नही पराये ही रहते है, मतलबी रिश्तो के लिये सब कुछ मिटा देते है, जो हक़ीक़त मै हो अपना उसे रुला के रखते है... बड़े अज़ीब है कुछ रिश्ते इनके, जो अपने है वही हस्ती इनकी मिटा देते है, सोच पराया हमे फिर जुल्म ढाते है... सच कहते है कुछ अपने नही पराये ही रहते है...

नए लोगो से मिलना है...

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अब नए लोगो से मिलना है , एक प्यारे से हमसफर को चुनना है... खुशियों का गीत गाना है , मिलकर हमे एक-दूजे को समझना है... दुनियाँ का सफर अब करना है , हाथो को थामे साथ-साथ चलना है... नए सपनों को बुनना है , मिलकर रंगों को उनमे भरना है... हँसना है, लड़ना है,उलझना है , हमे तो अब संग-संग रहना है... ना इतना वक़्त अब गवांना है , जल्दी ये फैसला करना है... अब नए लोगो से मिलना है , एक प्यारे से हमसफर को चुनना है...

थोड़ी दूर तो साथ चलो...

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मंजिल तक ना सही, थोड़ी दूर तो साथ चलो... हाथो मै हाथ लिये, कुछ देर ही सही, एक साथ तो चलो... गम भुलाकर कुछ देर का ही सही, मुस्कुराकर साथ-साथ तो चलो... जीवन ये क्षणिक ही सही, कुछ पल साथ मेरे भी जीते तो चलो... दिल हमारा लाचार ही सही, थोड़ी दूर तक मगर दिल लगाकर तो चलो... किश्मत मै मिलना ना सही, इस पल को जिन्दगी पूरी समझकर तो चलो... मंजिल तक ना सही, थोड़ी दूर तो साथ चलो...

किस से दिल की बात कहें...

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किस से दिल की बात कहें , कोई बन सके राज़दार वफ़ादार तो कहना... किस से दिल का हाल कहें , कोई बन सके दिलदार वफ़ादार तो कहना... किस से दिल का दर्द कहें , कोई मिल जाये सौदागर दर्द का तो कहना... किस से दिल के अरमान कहें , कोई बन सके अरमानो का बाज़ार तो कहना... किस से दिल की ख्वाइश कहें , कोई कर सके पूरी दिल की हर मुराद तो कहना... किस से दिल की बात कहें , कोई समझ सके दिल का हाल तो कहना...

छोटे-छोटे शहरो मै...

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छोटे-छोटे शहरो मै , सपने बड़े रखते है लोग... मेहनत जितनी करनी पड़े , फिर भी नही घबराते है लोग... छोटे-छोटे शहरो मै , दिल बड़ा ही रखते है लोग... घर मै लाख मुसीबतें हो, खाली हाथ नही लौटाते है लोग... छोटे-छोटे शहरो मै , जितना मर्ज़ी झगड़ा हो... रूठे को मना लेते है लोग , पास फिर अपने बुला लेते है लोग... छोटे-छोटे शहरो मै , जशन बड़ा मनाते है लोग... मिलकर साथ निभाते है लोग, कहकर दिल से निभाते है लोग...     

तुझे देखे ज़माना हो गया...

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नही चाहा था ऐसा हो गया, उसे देखे ज़माना हो गया... जिन्हे देखकर दिल मेरा आबाद रहा, वो दिल आज बेचारा वीरांना हो गया... जो घर बनाया था चाहत मै उसकी, वो घर मेरा अब बंजारा हो गया... नही चाहा था ऐसा हो गया, उसे देखे ज़माना हो गया... जिसकी चाहत मै जीना चाहा, वो खुद फलक़ का सितारा हो गया... मुझको दीवाना इस कदर करके, खुद ज़नाज़े मै रुखसत हो गया... नही चाहा था ऐसा हो गया, उसे देखे ज़माना हो गया...

परिभाषा एक परिवार की...

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परिवार बनता है प्रेम और संस्कारों से... एक-दूसरे को अपना कहकर पर अपनाने से... एक-दूसरे से अपने दिल की बात ना छुपाने से... घर के लोगो को समझने और समझाने से... सुख-दुख मैं साथ रहने से... अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने से... परिवार बनता है सबक लेकर गलतियों से... मिलकर साथ-साथ चलने से... परिवार बनता है रूठे हुये को मनाने से... मिलकर समस्याये सुलझाने से... परिवार बनता है हम सबके रहम से... ना खत्म करे इसे अपने स्वार्थ, ईर्ष्या और अहम से...     

ये मौसम मदमस्त सा...

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मौसम आये जाये , इस पर ना कोई हक़ जमाये... कभी सर्दियो की ये ठंडक है, कभी ये गर्मी जलाए... कभी ये रिमझिम-रिमझिम बरसे, जग की प्यास बुझाये... लो आ गया बसन्त भी देखो, भँवरे गीत सुनायें... मधुर-मधुर रस चूस फूलों से, अपनी प्यास बुझायें... तितलियाँ चारो और मंडराती फिरती, जीना ये तुमको सिखायें...

नज़र अंदाज मत करना...

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कभी नज़र अंदाज मत करना... किसी पिता के बहते आँसू को, किसी माँ की छुपी आह को,, बड़ा दर्द छिपा होता है इनकी हिम्मत मै भी... जब मुस्कुराकर बेटी का तुमसे विवाह करते है... प्यार से घर तुम्हारे विदा करते है... कभी नज़र अंदाज मत करना... उन माता-पिता की इच्छाओ का, जो बेटी तुम्हे देकर तुमसे रखते है,, बेटी की उनकी सदा खुश रखना... करते है जैसे वो प्रेम बेटी से... तुम भी उनकी बेटी से प्रेम रखना... कभी नज़र अंदाज मत करना... बेटी के माता-पिता के सम्मान को, जो उनका है स्वाभिमान उनकी बेटी को,, तुमसे उनकी उम्मीदो को... कभी नज़र अंदाज मत करना... कभी नज़र अंदाज मत करना...

कहाँ छिपे हो नटखट कृष्णा...

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कमरे की बिखरी चीजो मै ग़ुम, क्या यही कही छिपे हो तुम !! जानती हूँ नही रह सकते मेरे बिना अब तुम, कि आ जाओ अब और ना सताओ तुम !! पता है बाते मेरी सारी सुन रहे हो तुम, क्या अब भी सामने नही आओगे तुम !! नटखट बड़े ही हो गये हो तुम, कि सामने आ भी जाओ अब कृष्णा तुम !!

कोई भी दिन, ना हो तेरे बिन...प्यारी माँ...

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खूबसूरत, ममतामयी जो शब्द है वो है माँ, मेरी प्यारी, हम सबकी प्यारी माँ... बचपन मेरा लोरियों मै जिसकी झूमा, बचपन मेरा लोरियों मै जिसकी झूमा... हाँ, वो है मेरी प्यारी सी माँ... दौड़कर पीछे मेरे, पूरे घर मै जो नाज उठाती थी मेरे, वो है मेरी प्यारी सी माँ... वो माँ ही थी जिसके आँचल मै मैने जीना सीखा, हाँ, वो माँ ही थी जिसने हर दुख मेरे लिये सहा... वो उँगली पकड़कर मुझे स्कूल तक ले जाना, मेरा गुरु बनकर मुझे रोज पढ़ाना... अच्छे-बुरे का फर्क़ बताना, सही-गलत की मुझमे समझ लाना... हाँ वो माँ ही थी जिसने मुझे अच्छा इन्सान बनाया, पापा से झगड़कर वो मुझे कॉलेज पढ़ाना, जिन्दगी मै आगे बढ़ने का मुझमे हौंसला जगाना... सहेली बनकर जो दिल के मेरे करीब रही, बातो ही बातो मै जो मुझे तज़ुर्बा देती रही... भगवान बनकर जो मुझे समझती रही, जिन्दगी मेरी जो खूबसूरत करती रही... हाँ वो माँ ही थी जिसने हर पल मुझे सम्भाला, जिन्दगी क्या है, कैसी जीनी है मुझे सिखाया... माँ के इस रूप का सम्मान कीजिये, क्यूंकि जो आपकी खुशी मै ही अपनी खुशी देखती है, वो सिर्फ माँ है,  सिर्फ माँ, और सिर्फ माँ...

गुम हो गयी उनके चेहरे की वो रौनक...

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महफिल मै हर एक जगह रौनक दिखी मुझे, सिवाए उसके चेहरे की रौनक अब नही दिख रही थी... महफिल का हर एक दिल, जोरो से धड़कता था, सिवाए उनके दिल की धड़कन के, जो अब ना सुनाई देती थी... महफिलो की रौनक जो हुआ करती थी, आज महफिल मै खुद की बुझी-बुझी सी दिख रही थी... महफिल मै हर सख्श की जो जान हुआ करती थी, आज खुद मै वो ही, बेजान सी दिख रही थी... महफिल मै उसकी हर एक डूबा था मदहोशी मै, एक वो थी जो उस मदहोशी से दूर अंधेरो मै कही बैठी थी... महफिल मै हर एक जगह रौनक दिखी मुझे, सिवाए उसके चेहरे की रौनक अब नही दिख रही थी... महफिल मै हर दिल, दिलनशीं मै मशगूल था, सिवाए उसके जो शायद दिल के दर्द मै कही डूबी थी...

कौन हो तुम...

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कौन हो तुम ! प्रियतम मेरे या मेरे दुश्मन हो तुम... सपने मेरे या किसी और की हसरते हो तुम... कौन हो तुम ! दिलनशी मेरे या दिल को तोड़ने वाले हो तुम... सिर्फ मेरे या किसी और के भी हो तुम... कौन हो तुम ! मेरे दिल की दवा या मेरे दिल के जख्म हो तुम... मेरी खुशी की वजह या दर्द की वजह हो तुम... कौन हो तुम ! मेरे खिलखिलाने या मेरी खामोशी की वजह हो तुम... मेरी जीने की वजह या बर्बादी की वजह हो तुम... कौन हो तुम ! है कोई जवाब इसका... कि जवाब दो अब तुम...

फरियाद मेरी भी सुन ले...

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ए खुदा ज़रा सी इनायत तो कर दे, बेबस खड़ी हूँ तेरे दर पर कब से, जरा सा रहम तो अब तू कर दे... भूल से भी कोई भूल तो नही की है, फिर कब तक ये सज़ा, दूर अब तो ये बेबसी तू कर दे... सुना है दर से तेरे कोई खाली नही जाता, फरियाद कुछ मैने भी की है, झोली मेरी भी अब तू भर दे... कहते है ज़र्रे-ज़र्रे मै तू बसा है, रूह गर सच्ची हो तू उसकी सुनता है, कभी तो कहीं तो दिल की मेरी ख्वाइश पूरी कर दे... खुदगर्ज नही हूँ तू इतना जान ले, रहम बस इतना तू कर दे, जिन्दगी गर दी है तो थोड़ी खुशियाँ तो नाम कर दे... तेरे दर पर हर रोज़ सजदा करती हूँ, किसी रोज़ ऐसा भी तो कर, मै सुबह उठू और तू खुशियाँ मेरे आंगन कर दे... ए खुदा ज़रा सी इनायत तो कर दे, अन्धेरे मै डूबा है जहां मेरा, रौशनी मेरी इस जिन्दगी मै तू अब कर दे...

ना समझ सकी तेरी फितरत ऐ मेरे महबूब...

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ना समझ सकी तेरी फितरत ऐ मेरे महबूब तू आज भी मेरा है पर क्यूँ मेरा नही लगता है... प्यार से जो प्यार मैं ही मिला दे जहर, तू वो खंजर पुराना जहरीला लगता है... तू लाख कर ले मुहब्बत मै एहसान मुझ पर, ना जाने क्यूँ वो दीवाना सा तू नही लगता है... तू कह ले जितना मर्जी मुझको अपना, फिर भी तू अपना सा नही लगता है... दिल ना तोड़ूगा तेरा कभी भी कहकर, हर घड़ी दिल तोड़ने की वजह तू रखता है... दिलाकर प्यार मैं भरोशा हर पल मुझको, तू पीठ मैं खंजर घोन्पने की नीयत रखता है... वफ़ा की कसमे खाकर भी जब तू, फर्क़ अपने दिल मै मेरे लिये रखता है... कहकर मुझको अपना दिलबर जाने क्यूँ, दिल मै अपने तू गैरों को रखने लगता है... कहकर हजारों झूट मुझसे प्यार ही प्यार मै , औरो से वफ़ा, दग़ा की नीयत मेरे लिये रखता है... कर ले भरोशा मुझ पर कहकर, क्यूँ झूट की दीवार दरमियां तू रखता है... ना समझ सकी तेरी फितरत ऐ मेरे महबूब, तू आज भी मेरा है पर क्यूँ मेरा नही लगता है...

बेवफ़ा शुक्रिया...

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बेवफ़ा दूर जो तुम हुये, शुक्रिया,, कि हमे बहुत कुछ सिखा गये... रोते-रोते हँसना, और दुखो को छिपाना सिखा गये... हँसते-हँसते सहना, और गमो को छिपाना सिखा गये... बेवफ़ा दूर जो तुम हुये, शुक्रिया,, कि हमे बहुत कुछ सिखा गये... बेवफाओं को समझना, और चेहरा पढ़ना सिखा गये... दर्द को समझना, और दुनिया के लिये हँसना सिखा गये... मायूँसी मै रहना, पर जिन्दगी जीना सिखा गये... उस खुदा को समझना, और उस पर भरोसा करना सिखा गये... बेवफ़ा दूर जो तुम हुये, शुक्रिया,, कि हमे बहुत कुछ सिखा गये...

कुछ नया नही रहा जिन्दगी मै उनकी...

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कुछ नया नही रहा जिन्दगी मै उनकी अब हज़ार बार बस एक ही तस्वीर दीवार पर वो अपनी लगा लेते है... जहर दिल मै छिपाकर मेरे लिये ना चाहते हुये भी जब वो जमाने मै यूँ मुस्कुरा लेते है... मेरे आस्तित्व को मिटाने की कोशिश मै वो खुद को जलाकर और भी जमाने मै बद्नाम हो लेते है... अब कौन समझाये उस नासमझ को जहर जो मेरे लिये समेटे है उस जहर मै वो खुद को ही मिटा लेते है... कुछ नया नही रहा जिन्दगी मै उनकी अब हज़ार बार बस एक ही तस्वीर दिवार पर वो अपनी लगा लेते है...

लहजा...

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लहजा -ए- शब्दो का जो वो हुनर रखते, सच कहते है दूरियाँ ये दिलो की हम ना रखते,, कहकर अपना यूँ महफिल मै ना बेइज्जत करते, सच कहते है महफिल से कभी ना हम उनके रुखशत करते,, अहसाश जो मेरे शब्दो के वो समझ सकते, यूँ भरी महफिल मैं फिर ना हमे तार-तार करते,, क्यूँ लगा उनको महफिल हम उनकी छीन लेंगे, सच कहते है खुदा की कसम नही हम ये इरादे रखते,, लहजा -ए- शब्दो का जो वो हुनर रखते, हम भी महफिल मै उनकी कुछ तो रौनक रखते...

तो मज़ा आये ...

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  जिस्म पर जो फतह की तो क्या फतह की,, दिल पर फतह कर दिखाओ तो मज़ा आये... जाम पर जाम जो पिये तो क्या जाम पिये,, हुस्न की आँखो से जमकर पियो तो मज़ा आये... मर-मरकर इश्क़ मै जिये तो क्या जिये,, आग सीने मै उनकी भी ये लगा दो तो मज़ा आये... मुहब्बत मै उनको जो समझाया तो क्या समझाया,, बगावत वो खुद दुनिया से कर दे तो मज़ा आये... चाहत मै उनकी यूँ तड़पकर जिये तो क्या जिये,, चाहत मै वो भी तुम्हारी इस कदर तड़पे तो मज़ा आये... जिस्म पर जो फतह की तो क्या फतह की,, दिल पर फतह कर दिखाओ तो मज़ा आये...