ना समझ सकी तेरी फितरत ऐ मेरे महबूब...

ना समझ सकी तेरी फितरत ऐ मेरे महबूब
तू आज भी मेरा है पर क्यूँ मेरा नही लगता है...

प्यार से जो प्यार मैं ही मिला दे जहर,
तू वो खंजर पुराना जहरीला लगता है...

तू लाख कर ले मुहब्बत मै एहसान मुझ पर,
ना जाने क्यूँ वो दीवाना सा तू नही लगता है...

तू कह ले जितना मर्जी मुझको अपना,
फिर भी तू अपना सा नही लगता है...

दिल ना तोड़ूगा तेरा कभी भी कहकर,
हर घड़ी दिल तोड़ने की वजह तू रखता है...

दिलाकर प्यार मैं भरोशा हर पल मुझको,
तू पीठ मैं खंजर घोन्पने की नीयत रखता है...

वफ़ा की कसमे खाकर भी जब तू,
फर्क़ अपने दिल मै मेरे लिये रखता है...

कहकर मुझको अपना दिलबर जाने क्यूँ,
दिल मै अपने तू गैरों को रखने लगता है...

कहकर हजारों झूट मुझसे प्यार ही प्यार मै ,
औरो से वफ़ा, दग़ा की नीयत मेरे लिये रखता है...

कर ले भरोशा मुझ पर कहकर,
क्यूँ झूट की दीवार दरमियां तू रखता है...

ना समझ सकी तेरी फितरत ऐ मेरे महबूब,
तू आज भी मेरा है पर क्यूँ मेरा नही लगता है...

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