मेरे कमरे की वो खिड़की...

मेरे कमरे की खिड़की से,
वो खुला आसमान नजर आता है मुझको,,
माँ ये बहुत भाता है मुझको...

हवा का झौंका वो सुबह-सुबह का,
छूकर गुजर जाता है मुझको,,
माँ ये बहुत भाता है मुझको...

मन्दिर के वो भजन घन्टियाँ,
सुबह-शाम सुनाई देती है मुझको,,
माँ ये बहुत भाता है मुझको...

मेरे कमरे की खिडकी से,
तितलियाँ रँग-बिरंगी नजर आती मुझको,,
माँ ये बहुत भाता है मुझको...

रातो मै तारो की वो जगमग,
दूर उस आसमान मै नजर आती है मुझको,,
माँ ये बहुत भाता है मुझको...

चिड़ियों की चहचहाट मै भी,
मधुर संगीत सुनाई देता है मुझको,,
माँ ये बहुत भाता है मुझको...

मेरे बचपन का वो कमरा, वो खिड़की ,
और मेरा वो खुला आसमान,,
माँ ये बहुत भाता था मुझको...

गाँव अपना बहुत याद आता है मुझको,,
बहुत याद आता है मुझको...

Comments

Popular posts from this blog

काश कि ऐसा होता...

अपने - पराये मै फर्क़ नही... "अस्तित्वा एक स्त्री का"

जिन्दगी रुकती है, फिर आगे बढ जाती है...