लहजा...

लहजा -ए- शब्दो का जो वो हुनर रखते,
सच कहते है दूरियाँ ये दिलो की हम ना रखते,,

कहकर अपना यूँ महफिल मै ना बेइज्जत करते,
सच कहते है महफिल से कभी ना हम उनके रुखशत करते,,

अहसाश जो मेरे शब्दो के वो समझ सकते,
यूँ भरी महफिल मैं फिर ना हमे तार-तार करते,,

क्यूँ लगा उनको महफिल हम उनकी छीन लेंगे,
सच कहते है खुदा की कसम नही हम ये इरादे रखते,,

लहजा -ए- शब्दो का जो वो हुनर रखते,
हम भी महफिल मै उनकी कुछ तो रौनक रखते...




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