वो अनमोल रिश्ते कहाँ गुम गये ...


बेरुखी यूँ रिश्तो मैं अब सही नही जाती
हर बात अब जुबां से यूँ कही नही जाती...

अब सिर्फ दौलत की चाह हर और जगी है,
कुछ रिश्तो मैं बस पैसे की माया ही बची है...

भाई-भाई की कहानी भी अब वो पुरानी सी है,
पैसा-पैसा की ये पहेली अब ना सुलझी है...

रिश्तो की दिखती क्यूँ ये सच्चाई है,
घर-घर की अब क्यूँ यही कहानी सी है...

















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