लिखने -लिखने मैं भी बहुत फर्क होता है...
लिखने -लिखने मैं भी बहुत फर्क होता है जनाब,
कोई सिर्फ कलम से लिखता है, तो कोई जज़बात अपने दिल के लिख देता है...
यूँ तकल्लुफ ना कीजिये जज्बातो को मेरे समझने की,
यूँ तकल्लुफ ना कीजिये जज्बातो को मेरे समझने की...
समझ अगर जो गये, तो भरी आंखो से फिर बरसात होगी.
हाँ..लिखने -लिखने मैं भी बहुत फर्क होता है जनाब,,
कोई सिर्फ काम से लिखता है, तो कोई वजह जीने की लिख देता है अपनी...
कोई सिर्फ कलम से लिखता है, तो कोई जज़बात अपने दिल के लिख देता है...
यूँ तकल्लुफ ना कीजिये जज्बातो को मेरे समझने की,
यूँ तकल्लुफ ना कीजिये जज्बातो को मेरे समझने की...
समझ अगर जो गये, तो भरी आंखो से फिर बरसात होगी.
हाँ..लिखने -लिखने मैं भी बहुत फर्क होता है जनाब,,
कोई सिर्फ काम से लिखता है, तो कोई वजह जीने की लिख देता है अपनी...

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