क्या हो गया इस शहर को...



क्या हो गया है इस शहर को, विचारो मै क्यूँ हर और धुआं सा उठा है,,
चीख-पुकार सी मची है, हर शख्स जान बचाता फिर रहा है...

विचारो मै तालमेल नही, हर शख्स एक-दूजे को उंगली उठा रहा है,,
क्या हो गया है इस शहर को, विचारो मै क्यूँ हर और धुआं सा उठा है,,

चौपाले जहाँ सजती थी यारो की परिवारो की खुशियों से,
क्यूँ वहाँ नफरत, द्वेष,इर्ष्या, धोका, हर और पनप रहा है,,

बुरा इन्सान- इन्सान बनता जा रहा है नफरत मैं,
फिर क्यूँ धर्म एक-दूजे का बुरा सा लग रहा है,,

बात देश को सुन्दर बनाने की चली है,
फिर क्यूँ देश ये फूलों का उजाड़ा जा रहा है,,

क्या हो गया है इस शहर को, विचारो मै क्यूँ हर और धुआं सा उठा है,,
देश ये एकजुटता की कमी मैं, कहाँ का कहाँ जा रहा है।

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