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कर्म और वाणी...

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जब वक़्त अच्छा हो तो इन्सान मुह फाड़ कर चिल्लाता है, बुरे वक़्त पर मीठी वाणी अपनाने पर आ ही जाता है... कष्ट जो मिले कर्म के तो बहुत बड़ा ज्ञानी बन जाता है, फायदे मीठी वाणी के क्या है समझाने लगता है... बेढंगी देह को फिर अपनी झुटलाने लगता है, देह से बढ़कर सुन्दरता वाणी की है गाने लगता है... जुबां कुछ दिन ही सही सम्भालने तो लगता है, प्यार की चासनी मैं फिर जुबां अपनी दुबोकर रखता है ... औकात वो फिर से अपनी दिखाने ही लगता है, वक़्त अच्छा आते ही रंग वो गिरगिट सा जो बदलने लगता है... जब वक़्त अच्छा हो तो इन्सान मुह फाड़ कर चिल्लाता है, बुरे वक़्त पर मीठी वाणी अपनाने पर आ ही जाता है...

जिन्दगी रुकती है, फिर आगे बढ जाती है...

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ठहर गये हम भी जैसे बहते-बहते नदी ठहर जाती है... जैठ के पहर मैं जैसे बहती नदी भी सूख जाती है... धरती जो कभी तपती है तो घनघोर घटा भी बरस जाती है... मरते हुये को जैसे कभी दुआ भी लग जाती है... ये वक्त का पहिया है फिर रात ये सुबह मैं बदल जाती है... ठहर गये हम भी जैसे बहते बहते नदी ठहर जाती है... कुछ वक़्त का गम सही जिन्दगी फिर करवट बदलती है... ठहरी हुई नदी भी एक दिन सैलाब खुद में बहुत लाती है...

मेरे ख्वाब तेरी यादें...

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ख्वाबों के समंदर मैं आज फिर डूबने जा रही हूँ , कलम रख कर किताबों मैं फिर सोने जा रही हूँ ... ना करना अब हमे इस रात मै परेशान ,, आज फिर मै उनकी यादो को जीने जा रही हूँ ...

काश कि ऐसा होता...

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ख्वाब वो भी हमारे देख लेते तो अच्छा था... तस्वीर मैं हमे भी अपनी बसा लेते तो अच्छा था,, समन्दर की गहराइयाँ जो हम होते तो अच्छा था... कुछ यूँ ही मुझमे वो डूब जाते तो अच्छा था,, सिवाए उनके कोई पास ना हमारे आता तो अच्छा था... सफ़र जज़्बात ऐ कश्तियों मैं मेरी वो कर जाते तो अच्छा था,, इस कदर मुझमें मोतियों सा वो बिखर जाते तो अच्छा था... हार मोतियों का बनाकर उन्हे हम पहन लेते तो अच्छा था,, काश कि अमृत सा उनके लिये हम बन जाते तो अच्छा था... पीकर हमे खुद मैं ही बसा वो लेते तो अच्छा था,,     

वो अनमोल रिश्ते कहाँ गुम गये ...

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बेरुखी यूँ रिश्तो मैं अब सही नही जाती हर बात अब जुबां से यूँ कही नही जाती... अब सिर्फ दौलत की चाह हर और जगी है, कुछ रिश्तो मैं बस पैसे की माया ही बची है... भाई-भाई की कहानी भी अब वो पुरानी सी है, पैसा-पैसा की ये पहेली अब ना सुलझी है... रिश्तो की दिखती क्यूँ ये सच्चाई है, घर-घर की अब क्यूँ यही कहानी सी है...

सच कहना तुम्हे मेरी कसम ...

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सुनो!! तुम्हारी माँ कहती है, मै तुम्हारे लायक नही हूँ... तुझ सी हजार मेरे बेटे पर मरतीं है,, माना कि ये उनका गुरूर सही, पर बस इतना सा बता दो,, क्या सचमुच दुनिया की हर लड़की तुम पर मुझ सी मरती है...

वफ़ा या बेवफ़ा

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बेपनाह मुहब्बत मैं उनकी हम इस कदर दीवाने थे, जुल्म करके हम पर ही.. वो हँस कर हमसे मिलते थे... वफा-बेवफ़ाई क्या होती है शायद वो न समझते थे, अन्जान इस दिल की वफ़ा से बेवफ़ाई वो करते थे... उन्हे वफ़ा भी उनसे थी... जिस्म पर जो मरते थे, सोचकर मुहब्बत है उसकी वो भी उस पर मरते थे... हमसे मिलकर तो हाल ए दिल की अपनी बाते करते थे, हम उनसे कैसे कहते कि हम भी उन पर मरते थे... तन्हाई भी अब हमसे हमारी कहती थी... कुछ मुहब्बत बस घुट-घुट कर ही रहती है,, तेरी वफ़ा मुहब्बत की.. शायद नसीब मैं नही उनकी... नसीब मैं कुछ की वफ़ा नही बेवफाऐ भी रहती है !!